Saturday, March 12, 2011

जुस्त-ए-जू


मै इंतेजार करता हुं,   
तेरे  आने  का  मजलिस  में,
मै दिन गुजार करता हुं, 
ये आंखे चार  करने को,
हर आफताब से माहताब तक,
हर सेहेर से  हर  रात तक...

ओ रूह-ए-सुखन ,
मै तलाश करता  हुं,
तेरी आहट का चौखट पे,
तेरे सजदे का  मस्जिद में,
तेरी खुशबू का महफिल में,
तेरे जज्बे का  इस  दिल  में...

मै जब सजदे में झुकता हुं,
तो आंखे बंद नही करता,
के क्या जाने खुदा तब ही,
कही रहमत अता कर दे,
तुझे रखने कि इस दिल में,
मुझे कुव्वत अता कर दे...

तेरे होने न होने का,
मुझे अब शक़ सा होता है,
के तारो के निकलने का,
मुकम्मल वक़्त होता है,
मै अब तो अमन चाहता हुं ,
खुद से भी, खुदा से भी,
के अब इतनी इनायत कर,
मुझे खुद से रिहा कर दे... 

5 comments:

Rohan said...

tujhe rakhne ki is dil me kuvvat ata kar de...kya likha hai guchu da, saari lines ek se badhkar ek..

Vikash Kumar said...

har ek line me ek ehsaas chhupa hai....loved the 3rd para most....ending is just magnificent.
मुझे खुद से रिहा कर दे...

Avimuktesh said...

"hain aur bhi jamane me shukhanwar bahut achche... kahte hain ki Ghalib ka hai andaz-e-bayan aur!!"
agar Ghalib ne ye line apne liye na likhi hoti to main aapke liye likhta :) machau poem :))

Kharageous said...

One of the best you wrote...Gr8 work.

Vikram Rathi said...

khub bhaalo Gucchu da :)
kuch chaos macha rhe ho..