Tuesday, February 18, 2014

मैं क्या चाहता हूँ

इस बेबसी में ख़लल चाहता हूँ ,
किसी ओर से एक पहल चाहता हूँ; 
मैं ये सोचता हूँ कि रुक जाऊं सोचूं, 
मैं जीवन में थोड़ा सब्र चाहता हूँ ;

शायद मैं थोड़ा सफ़र चाहता हूँ ,
मैं राहों मैं थोड़ा बदल चाहता हूँ ;
कभी खुद को आगे को देता हूँ धक्का, 
कभी ऊँचे पेड़ों का फ़ल चाहता हूँ ;

कभी मुझको लगता है सब कुछ छलावा, 
कभी मोड़ पे एक महल चाहता हूँ ;
मुझे आते जाते ये बादल लुभाते ,
मैं शायद ये अम्बर पटल चाहता हूँ; 

मैं आया कहाँ से, कहाँ जाउंगा मैं,
मैं सारे सवालों का हल चाहता हूँ; 
जब मन में हैं उठते यह सारे बवंडर, 
मैं ये सोचता हूँ, मैं क्या चाहता हूँ । 


1 comment:

Prateek Kohli said...

Made my day. Words beautifully describing so many young minds of today.