Saturday, April 9, 2011

कश्मकश


एक ठहराव, एक  अलगाव, एक उदासी सी है, 
रूह अन्दर से कुछ रुंवासी सी है, 
अजब सा एक एहसास मुझे घेरे है आदम,
बंद दरवाज़ों की, मन के, एक तलाशी सी है ... 

इस रेत पे ये लकीरें, किसने उकेरीं हैं,
सुखी सी इस ज़मीन पर, बूँदें बिखेरी हैं,
कौन है मायूस इस माहौल से इतना, 
रात के आँचल की किसने, परतें उधेरी हैं ...   

क्या इन अंधेरों को कोई पहचानता है,
क्या इन आवाजों में कोई समानता है,
बड़ी अजीब बात है, ये सब सुना देखा सा लगता है, 
क्या कोई इस सब का मतलब जानता है ...

ये गलियारे यूँ ही मिलते हैं, जुड़ते हैं, खो जाते हैं,
ये बवंडर थोडा माखौल उड़ा कर, सो जाते हैं,
इन भवरों के बनने का कारण समझ नहीं आता, 
मगर इन रातों के भी, आखिर में सवेरे, हो जाते हैं ...

Saturday, March 12, 2011

जुस्त-ए-जू


मै इंतेजार करता हुं,   
तेरे  आने  का  मजलिस  में,
मै दिन गुजार करता हुं, 
ये आंखे चार  करने को,
हर आफताब से माहताब तक,
हर सेहेर से  हर  रात तक...

ओ रूह-ए-सुखन ,
मै तलाश करता  हुं,
तेरी आहट का चौखट पे,
तेरे सजदे का  मस्जिद में,
तेरी खुशबू का महफिल में,
तेरे जज्बे का  इस  दिल  में...

मै जब सजदे में झुकता हुं,
तो आंखे बंद नही करता,
के क्या जाने खुदा तब ही,
कही रहमत अता कर दे,
तुझे रखने कि इस दिल में,
मुझे कुव्वत अता कर दे...

तेरे होने न होने का,
मुझे अब शक़ सा होता है,
के तारो के निकलने का,
मुकम्मल वक़्त होता है,
मै अब तो अमन चाहता हुं ,
खुद से भी, खुदा से भी,
के अब इतनी इनायत कर,
मुझे खुद से रिहा कर दे... 

Wednesday, January 19, 2011

जीवन

अनदेखे  गलियारों  में, अलफ़ाज़  लिए,  
कुछ साज़ लिए,
अनछूई सी  रातों  में,
 कुछ  कच्चे  चिट्ठे  बांच  लिए,
अंधियारों  ने  अंगराई  ली,
आलिंगन में उजियारों के,
कुछ अपने मन की बात कही,
कुछ सबके दुखड़े बाँट  लिए,
सूने  मन  की परिभाषा तो,
अपने  ही  अन्दर  बसती  है,
कुछ  कहते  हैं  चुप  रहने  को,
कुछ  कहते  हैं  बिन  सांस लिए, 
एक  अजायबघर  में  भी,
सब  अजब  अजब  सी  चीजों  में,
कुछ लोग दिखाई देते हैं,
पहचाने से अंदाज़ लिए,
अचरज सा मुझको होता है,
जीवन के अजब विवादों पर,
जब  शोर  सुनाई देता है,
अपवाद  भरे  संवाद  लिए |  

Thursday, November 11, 2010

असमंजस्य

एक शाम अँधेरी 
कौतुहल से घिरे हुए 
खुद को मैंने ,
खुद से बातें करते देखा . 
  
एक घडी गोधुली ,
अलसाई आँखों से मैंने 
चारों ओर चलते जीवन को 
मुझपे व्यंग सा कसते देखा 

उस रोज़ पुरानी 
चीज़ों ने थी कमर कसी 
मुझको बीते कल में 
खींच खींच के ले जाने को 

एक लिफाफा 
अँधेरे का 
मेरे चारों ओर बन आया 
धीरे धीरे ,

बड़ा अजब षड़यंत्र लगा ये 
मुझे नहीं विश्वास हुआ 
अर्ध निद्रा में घिरे हुए 
अस्थिर से  मन का साथ 
ये कैसा खिलवाड़ हुआ  ...

Tuesday, September 28, 2010

क्षणभंगुर

घने  अँधेरे  कोहरे  की  चादर  में  लिपटा क्षण बैठा है ,
बीच  भीड़  के  सहमा, सकुचा, घबराया  सा क्षण बैठा  है,
कुछ  को  नज़र  नहीं  भी  आता , सूक्ष्म  स्वरुप  है .. क्षण  बैठा  है, 
कुछ  की  गति  तीव्र  है  इतनी,  शिथिल  मगर  वो  क्षण  बैठा  है  ...

कभी  कभी  ये  दृढ  निश्चई  ..  अटल  तपस्वी  सा  दिखता  है  ...
और  कभी  ये  चंचल  नटखट  बच्चे  सा  भागा  फिरता  है  ...
सूर्य  की  पहली  किरणों  से  पहले  उठता  अंगराई  लेता ..
मंदिर  की  घंटियों  से  पहले , हमनें  देखा , क्षण  बैठा  है ...

कभी  ये  नवयुवती  के  यौवन  के  बखान  सा  है  मदिरामए ...
वयोवृद्ध  के  मन   सा  गहरा , कभी  ये  लगता  है  करुनामए  ...
जल  प्रपात  के  जल  सा  मीठा,  निर्मल  शीतल  जीवनदाई  ...
कभी  समाज  में  फैले  तम  का  मुझको  लगता  ये  अनुयायी

क्षण - क्षण  मिल के जीवन बनता, जीवन है  क्षण  का मोहताज, 
क्षण  - क्षण जीवन लेता क्षण से, जिंदा रहने का विश्वास,
एक प्रलय के क्षण से डर कर जीवन भर मानव चलता है,
कभी ठहर कर इसको देखो,  क्षणभंगुर ये क्षण कैसा है ...

Wednesday, September 16, 2009

ये क्या चाहती हैं

ये राहें मेरी खोजती आशियाने

ये बातें मेरी खोजती है ठिकाने ,

घर कोई बख्तरजदा चाहतीं हैं

ये उरने को थोरी हवा चाहतीं हैं

ये चाहती है नीला सा एक आसमा हो

जहाँ साँस लेने को आबो हवा हो ..

ये कहतीं है दे दो मुझे एक ठिकाना

मगर मुझसे सारा जहाँ चाहती हैं


मैं आपने ही भीतर जगह चाहता हूँ ….

मैं चलने की थोरी वजह चाहता हूँ

नही मांगता हूँ मैं नभ के सितारे

मगर एक दीपक सदा चाहता हूँ

मैं दीपक की लौ मैं ठिठक कर ठिठुर कर

नही कहता जीवन हो मेरा सिमट कर

मगर फिर भी जीवन में लौ चाहता हूँ

हूँ मेरे मोती ,मैं जौ चाहता हूँ


रेतीला बवंडर

जो आया हो अन्धर

ये छोटा सा एक आशियाँ चाहती हैं

ये मुझसे बस थोरी दुआ चाहती हैं

ये मेरे ही अन्दर की हैं जो हवाएँ

ये जीने की आबो हवा चाहती हैं

ये कहतीं है दे दो मुझे एक ठिकाना

मगर मुझसे सारा जहाँ चाहती हैं

Friday, July 3, 2009

कौन है वहां…

आज अकेला जान मुझे ….

एक ख्वाब अचानक

मेरे घर आकर ….

दरवाज़े पर दस्तक देकर

कुछ देर रुका शायद

लेकिन जब मैंने क़दमों की आहट सुन दरवाज़ा खोला

कोई नही था


आज अकेले बैठा था जब

एक हवा का झोंका आकर

मेरे बालों में अपनी उँगलियाँ फिरा कर

मुरने से पहले मेरे कहीं छुप गया

मैंने खोजा उसको ..

हर ओर आवाज़ लगाई मैंने लेकिन वहाँ ….

कोई नही था


मेरी खिरकी पे कल रात ….

जब मेरी आँखें बोझिल थी

चाँद शायद अपने पथ से

थोरा थोरा नीचे आकर ….

मेरी खिरकी में झाँक रहा था

कोमल किरणे आंखों पे परने से ..

मेरी आंख खुली तो

वापस वो जल्दी से ..

अपने बादलों के कम्बल में ...

यूँ छुप गया जैसे वहां ..

कोई नही था ….


कल चलते चलते मैंने अपना नाम सुना

मुर कर जब देखा तो पाया

दूर क्षितिज पर कोई खरा है ….

उससे देख कर मैं चला उधर

तेज़ कदम लेकर …।

आस पास के शोर को मन से ओझल कर कर

हाथों के भारी समान को वाही छोर कर

पर जैसे ही लगा पहुचने पास मैं उसके

आँख खुल गई मैंने देखा ….

कोई नही था …..