Saturday, April 9, 2011
कश्मकश
Saturday, March 12, 2011
जुस्त-ए-जू
Wednesday, January 19, 2011
जीवन
Thursday, November 11, 2010
असमंजस्य
Tuesday, September 28, 2010
क्षणभंगुर
Wednesday, September 16, 2009
ये क्या चाहती हैं
ये राहें मेरी खोजती आशियाने …
ये बातें मेरी खोजती है ठिकाने ,
न घर कोई बख्तरजदा चाहतीं हैं …
ये उरने को थोरी हवा चाहतीं हैं
ये चाहती है नीला सा एक आसमा हो …
जहाँ साँस लेने को आबो हवा हो ..
ये कहतीं है दे दो मुझे एक ठिकाना …
मगर मुझसे सारा जहाँ चाहती हैं …
मैं आपने ही भीतर जगह चाहता हूँ ….
मैं चलने की थोरी वजह चाहता हूँ …
नही मांगता हूँ मैं नभ के सितारे …
मगर एक दीपक सदा चाहता हूँ …
मैं दीपक की लौ मैं ठिठक कर ठिठुर कर …
नही कहता जीवन हो मेरा सिमट कर …
मगर फिर भी जीवन में लौ चाहता हूँ …
न हूँ मेरे मोती ,मैं जौ चाहता हूँ …
रेतीला बवंडर …
जो आया हो अन्धर …
ये छोटा सा एक आशियाँ चाहती हैंये मुझसे बस थोरी दुआ चाहती हैं …
ये मेरे ही अन्दर की हैं जो हवाएँ …
ये जीने की आबो हवा चाहती हैं
ये कहतीं है दे दो मुझे एक ठिकाना …
मगर मुझसे सारा जहाँ चाहती हैं …
Friday, July 3, 2009
कौन है वहां…
आज अकेला जान मुझे ….
एक ख्वाब अचानक …
मेरे घर आकर ….
दरवाज़े पर दस्तक देकर …
कुछ देर रुका शायद …
लेकिन जब मैंने क़दमों की आहट सुन दरवाज़ा खोला …
कोई नही था …
आज अकेले बैठा था जब …
एक हवा का झोंका आकर …
मेरे बालों में अपनी उँगलियाँ फिरा कर …
मुरने से पहले मेरे कहीं छुप गया …
मैंने खोजा उसको ..
हर ओर आवाज़ लगाई मैंने लेकिन वहाँ ….
कोई नही था …
मेरी खिरकी पे कल रात ….
जब मेरी आँखें बोझिल थी …
चाँद शायद अपने पथ से …
थोरा थोरा नीचे आकर ….
मेरी खिरकी में झाँक रहा था …
कोमल किरणे आंखों पे परने से ..
मेरी आंख खुली तो …
वापस वो जल्दी से ..
अपने बादलों के कम्बल में ...
यूँ छुप गया जैसे वहां ..
कोई नही था ….
कल चलते चलते मैंने अपना नाम सुना …
मुर कर जब देखा तो पाया …
दूर क्षितिज पर कोई खरा है ….
उससे देख कर मैं चला उधर …
तेज़ कदम लेकर …।
आस पास के शोर को मन से ओझल कर कर …
हाथों के भारी समान को वाही छोर कर …
पर जैसे ही लगा पहुचने पास मैं उसके …
आँख खुल गई मैंने देखा ….
कोई नही था …..
