Saturday, March 12, 2011
जुस्त-ए-जू
Wednesday, January 19, 2011
जीवन
Thursday, November 11, 2010
असमंजस्य
Tuesday, September 28, 2010
क्षणभंगुर
Wednesday, September 16, 2009
ये क्या चाहती हैं
ये राहें मेरी खोजती आशियाने …
ये बातें मेरी खोजती है ठिकाने ,
न घर कोई बख्तरजदा चाहतीं हैं …
ये उरने को थोरी हवा चाहतीं हैं
ये चाहती है नीला सा एक आसमा हो …
जहाँ साँस लेने को आबो हवा हो ..
ये कहतीं है दे दो मुझे एक ठिकाना …
मगर मुझसे सारा जहाँ चाहती हैं …
मैं आपने ही भीतर जगह चाहता हूँ ….
मैं चलने की थोरी वजह चाहता हूँ …
नही मांगता हूँ मैं नभ के सितारे …
मगर एक दीपक सदा चाहता हूँ …
मैं दीपक की लौ मैं ठिठक कर ठिठुर कर …
नही कहता जीवन हो मेरा सिमट कर …
मगर फिर भी जीवन में लौ चाहता हूँ …
न हूँ मेरे मोती ,मैं जौ चाहता हूँ …
रेतीला बवंडर …
जो आया हो अन्धर …
ये छोटा सा एक आशियाँ चाहती हैंये मुझसे बस थोरी दुआ चाहती हैं …
ये मेरे ही अन्दर की हैं जो हवाएँ …
ये जीने की आबो हवा चाहती हैं
ये कहतीं है दे दो मुझे एक ठिकाना …
मगर मुझसे सारा जहाँ चाहती हैं …
Friday, July 3, 2009
कौन है वहां…
आज अकेला जान मुझे ….
एक ख्वाब अचानक …
मेरे घर आकर ….
दरवाज़े पर दस्तक देकर …
कुछ देर रुका शायद …
लेकिन जब मैंने क़दमों की आहट सुन दरवाज़ा खोला …
कोई नही था …
आज अकेले बैठा था जब …
एक हवा का झोंका आकर …
मेरे बालों में अपनी उँगलियाँ फिरा कर …
मुरने से पहले मेरे कहीं छुप गया …
मैंने खोजा उसको ..
हर ओर आवाज़ लगाई मैंने लेकिन वहाँ ….
कोई नही था …
मेरी खिरकी पे कल रात ….
जब मेरी आँखें बोझिल थी …
चाँद शायद अपने पथ से …
थोरा थोरा नीचे आकर ….
मेरी खिरकी में झाँक रहा था …
कोमल किरणे आंखों पे परने से ..
मेरी आंख खुली तो …
वापस वो जल्दी से ..
अपने बादलों के कम्बल में ...
यूँ छुप गया जैसे वहां ..
कोई नही था ….
कल चलते चलते मैंने अपना नाम सुना …
मुर कर जब देखा तो पाया …
दूर क्षितिज पर कोई खरा है ….
उससे देख कर मैं चला उधर …
तेज़ कदम लेकर …।
आस पास के शोर को मन से ओझल कर कर …
हाथों के भारी समान को वाही छोर कर …
पर जैसे ही लगा पहुचने पास मैं उसके …
आँख खुल गई मैंने देखा ….
कोई नही था …..
Sunday, March 15, 2009
कहाँ है मेरा राम .....
The original poem as written by Pd. Ram Prasad Bismil
कभी तो कामयाबी पर मेरा हिन्दोस्तान होगा
रिहा सय्याद के हाथों से अपना गुलसितां होगा
चखाएंगे मज़ा फ़िर वादी ऐ गुलशन का गुलचीन को
बहार आएगी उस दिन जब ये अपना आशियाँ होगा
वतन की आबरू का पाश देखे कौन करता है
सुना है आज मकतल मैं हमारा इन्तेहाँ होगा
जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हरगिज़
न जाने बाद मुर्दन मै कहाँ और तू कहाँ होगा
शहीदों की चिताओं पे लगेंगे हर बरस मेले
वतन पे मिटने वालों का यही बाकी निशाँ होगा ....
My take on it ...........
उन्होंने जान दे दी थी .... सोचा था भला होगा
सोचा था की उनका देश भी आगे खरा होगा
नही वो जानते थे ये मगर की हम ... जो पहले लुटे थे .... फ़िर कटे थे ..
उन्हें अब बाँट देगे वो...
के अब भाई ही भाई का गला यूँ रेतता होगा....
था जिसको पहले बांटा नाम से और काम से सबने
उन्हें अब धर्म बांटेगा ... उन्हें अब देश बांटेगा ..
भगवान को अल्लाह ने काफिर कहा था कब ..
मगर इंसान ही अब वो खुदा और राम बांटेगा..
चखना था मज़ा जिस वादी ऐ गुलशन का गुलचीन को ...
न वो वादी कभी आई ... और नही समाँ आया ...
शहीदों की चिताएं तो अब हैं हो चुकी ठंडी ;
मगर नही लगे मेले और न नाम ओ निशाँ आया ;
कोई जो नाम भी उनका जो पूछे ... हम कहेंगे .... कौन ????
के होगी बात भी गर आज उनकी हम रहेंगे मौन ..
लगता है यही है कामयाबी ... गलती थी ये उनकी ही ...
सोचा था जिन्होंने की ये सय्याद बाहरी है ...
जिन्होंने लुटा है हमको .... हमें काटा और बांटा है ..
वो अपने हाथ ही हैं दोस्त ... वो अपनी ही आरी है ....
